हमारा कार्य भारत

हमारा मानना है कि हर व्यक्ति का जीवन एक समान कीमती है और हम साथ मिल कर काम करें तो असमानता और गरीबी को कम कर सकते हैं। अपने साझेदारों के साथ मिल कर हम स्वास्थ्य, स्वच्छता, वित्तीय सुविधाओं तक लोगों की पहुंच और कृषि के विकास जैसी चुनौतियों पर काम कर एक अरब से ज्यादा भारत वासियों के जीवन को बेहतर करने में प्रयासरत हैं।

हम क्या करते हैं

भारत अपने नागरिकों के स्वास्थ्य और सामाजिक विकास में काफी गंभीरता से निवेश कर रहा है, ताकि लाखों लोगों को देश के विकास और आर्थिक प्रगति में भागीदार बनाया जा सके। बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सभी प्रयास भारत के लक्ष्यों की दिशा में हैं। हम भारत की केंद्र और राज्य सरकारों के साथ करीबी सहयोग करते हुए सामुदायिक समूहों, गैर लाभार्थ संगठनों, अकादमिक संस्थानों, निजी क्षेत्र और विकास संगठनों के साथ अपने साझा लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए साझेदारी करते हैं।

बिहार और उत्तर प्रदेश पर विशेष निवेश के साथ, हम नए समाधान तलाश रहे हैं ताकि महत्वपूर्ण सेवाओं की गुणवत्ता और दायरा बढ़ाया जा सके।

देश में हमारा काम इन चार मुख्य क्षेत्रों में है: स्वास्थ्य, स्वच्छता, कृषि विकास और गरीबों के लिए वित्तीय सेवाएं

निदेशक की ओर से संदेश

अपने विकास के क्रम में भारत की यह विशेषता रही है कि उसने अपनी गरीब आबादी की जरूरतें पूरी करने के लिए विज्ञान और टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में हुई प्रगति का इस्तेमाल बहुत ही सोच—विचार कर किया है। नई दिल्ली में पिछले साल नवम्बर में, बिल गेट्स ने भारत के प्रति अपने 'आशावादी नजरिये' का कारण बताया था। उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया में अपने संबोधन में कहा था, यह देश '' डिजिटल टैक्नोलॉजी सहित टैक्नोलॉजी को अपना रहा है और उसका इस्तेमाल कर रहा है'' ताकि ''इतिहास की पुस्तकों में इस बारे में एक नया अध्याय लिखा जा सके कि बड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए राष्ट्र और जनता किस प्रकार तत्पर हो सकते हैं।'' यह पत्र इस कार्य के लिए भारत द्वारा अपनाए जा रहे कुछ रास्तों तथा बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन द्वारा इन प्रयासों में सहायता देने के लिए स्थानीय संस्थाओं के साथ मिलकर किए जा रहे महत्वपूर्ण सहयोग के तरीकों का उल्लेख करता है।

पिछले कुछ वर्षों में, गेट्स फाउंडेशन ने इस बारे में बहुत कुछ सीखा है कि प्रभावी साझेदार कैसे बन सकते हैं। हम भारत की विशालता और विविधता को समझते हैं और यह बात बखूबी जानते हैं कि हमारे पास इतने संसाधन नहीं हैं कि हम यहां केवल अपने बल पर विविध कार्यक्रमों में सहायता दे सकें। हम भारत की जटिलताओं को भी स्वीकार करते हैं और जानते हैं कि सबसे विश्वसनीय और टिकाऊ समाधान उन्हीं स्थानीय नायकों द्वारा प्रदान किए जा सकते हैं, जिन्होंने अपना जीवन भारत में काम करने पर खर्च कर दिया हो । इसी कारण हम विरला ही कोई कार्यक्रम नए सिरे से शुरू करते हैं, इसकी बजाए हम नायकों और समुदायों के साथ साझेदारी करना ज्यादा बेहतर समझते हैं। हम स्वास्थ्य और विकास की प्रमुख चुनौतियों से जूझने के लिए उनके द्वारा किए जा रहे प्रयासों में सहायता करते हैं।

अक्सर गेट्स फाउंडेशन विशेषज्ञता के क्षेत्र में भी योगदान देती है। हम मामलों और प्रमुख विशेषज्ञों के जानकार हैं और इसलिए सही लोगों और संसाधनों को साथ जोड़ने में सहायता दे सकते हैं। कई अवसरों पर हम आंकड़े उपलब्ध करवा कर भी अपना योगदान देते हैं। हम परीक्षण और बेहतर कार्यनीति तैयार करने के लिए तेजी से पायलट प्रोजेक्ट्स स्थापित करते हैं और निर्णय लेने वालों को उदाहरण और प्रमाण उपलब्ध कराते हैं। हम परम्परागत सीमाओं में संबंध बनाने में भी सहायता करते हैं, ताकि सरकारें, गैर सरकारी संगठन और निजी क्षेत्र की कम्पनियां जरूरतमंदों तक तेजी से नवाचार उपलब्ध कराने के लिए एक—दूसरे के साथ सहयोग कर सकें। हमारे निवेश से कमियां दूर होती हैं और अच्छे विचारों को जीवन रक्षक समाधान बनाने में मदद मिलती है।

आगे हैं वे चार कहानियां, जो बताती हैं कि —देश भर में साझेदारों के निकट सहयोग से हम अपना कार्य किस प्रकार कर रहे हैं — जबकि भारत सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के प्रयास कर रहा है।

 

स्वच्छता

भारत सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन के जरिए देश को खुले में शौच की प्रथा से मुक्ति दिलाने का दृढ़ संकल्प लिया है। यह एक महत्वपूर्ण पहल है, क्योंकि मल संबंधी अपशिष्टों में मौजूद बैक्टीरिया, परजीवी और विषाणु हर साल 200,000 से ज्यादा बच्चों की मौत और साथ ही साथ बहुत से बच्चों और बड़ों की खराब सेहत के लिए जिम्मेदार होते हैं। खुले में शौच समाप्त कराना जहां बहुत महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण पहला कदम है, वहीं यह स्वच्छता संबंधी समस्या का पूरी तरह समाधान करने की दिशा में एक घटक भर है। सभी समुदायों के लिए सुरक्षित स्वच्छता सुनिश्चित कराने के लिए मल अपशिष्ट का शोधन और सुरक्षित निपटान महत्वपूर्ण कदम हैं। आज, पूरे भारत में उत्पन्न होने वाले मानव अपशिष्टों का लगभग 70 प्रतिशत अंश अशोधित अवस्था में ही वायुमंडल में प्रवेश कर जाता है। जहां एक ओर इंदौर और नासिक जैसे शहर स्वच्छता का समग्र रूप से समाधान कर रहे हैं , वहीं दूसरी ओर भारत के ज्यादातर शहरी और ग्रामीण क्षेत्र सफलतापूर्वक ऐसा कर पाने में नाकाम रहे हैं। पूरी तरह केंद्रीकृत सीवेज प्रणालियां जल और ऊर्जा की अधिक लागत के कारण बेहद महंगे तरीके हैं इस कारण बड़े हिस्से में लम्बित हैं। दरअसल, अब वे आधुनिक शहरों के लिए वे सुझाया जाने वाला एकमात्र समाधान नहीं रह गए हैं। 70 प्रतिशत से ज्यादा परिवारों द्वारा सेप्टिक टैंक्स और पिट लेट्रीन्स जैसे मौके पर स्वच्छता रोकथाम प्रणालियां (ऑनसाइट कंटेनमेंट सिस्टम्स) इस्तेमाल में लाए जाने के कारण ज्यादातर शहरी क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत, बिना सीवर लाइन वाले स्वच्छता समाधान बड़ी भूमिका निभाने जा रहे हैं। ये समाधान छोटे ढांचागत उपायों और कम पूंजी और प्रचालन खर्च के साथ स्थानीय जरूरतों के मुताबिक ढाले जा सकते हैं।

इन समाधानों की व्यवहार्यता प्रदर्शित करने के लिए, 2014 में गेट्स फाउंडेशन ने बेंगलुरू शहर के निकट देवनहल्ली में पहला सामुदायिक फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट (एफएसटीपी) बनाने और सुचारू रूप से चलाने में एक स्वच्छता कम्पनी की मदद की। एक साल से भी कम समय में, देवनहल्ली में शोधित किए जाने वाले अपशिष्ट की मात्रा 0 से 40 प्रतिशत हो गई। यह संयंत्र ठोस अपशिष्ट से तरल को अलग करता है, दोनों से रोगाणुओं को मिटाकर शोधित करता है तथा उनसे खेतीबाड़ी के काम में उपयोगी कम्पोस्ट और पानी तैयार करता है। यह संयंत्र अपेक्षाकृत मूलभूत टैक्नोलॉजी का इस्तेमाल करता है, लेकिन इसे मौलिक स्वरूप प्रदान किया गया है, इसलिए इसे स्थानीय समुदाय की जरूरतों के मुताबिक ढाला जा सकता है, इससे दुर्गंध नहीं फैलती और इसमें बिजली का इस्तेमाल नहीं किया जाता—यह अधिकतर गुरुत्वाकर्षण से संचालित होता है। अपने मनमुताबिक डिजाइन की बदौलत, इस संयंत्र का निर्माण और परिचालन अपेक्षाकृत किफायती दामों पर किया जाता है। इससे राज्य सरकारों और नगर पालिकाओं को लागत—लाभ विश्लेषण एकदम स्पष्ट हो जाता है और वे अपने बल पर इस तरह के छोटे निवेश करने पर विचार करते हैं।


एफएसटीपी का निर्माण वर्तमान में ओडिशा में किया जा रहा है। तमिलनाडु, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बिहार इसी तरह के संयंत्रों का निर्माण करने की योजना बना रहे हैं। हमें आशा है कि 2020 तक, 25 से ज्यादा ऐसे संयंत्र , भारत भर में 20,000 जितनी कम आबादी वाले और 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले, दोनों ही तरह के कस्बों और शहरों में स्वच्छता में सहायता दे रहे होंगे।

 

कॉमन एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर (सीएएस)

शक्तिशाली, लगभग सब जगह मौजूद मोबाइल फोन , स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने के व्यापक प्रयासों में सरकार को सहायता दे रहे हैं। महिला और बाल विकास मंत्रालय के अनुरोध पर गेट्स फाउंडेशन ने मंत्रालय का नया कॉमन एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर (सीएएस) विकसित और प्रारंभ करने के लिए एक साझेदार के साथ काम किया है। सीएएस, बच्चों को स्वस्थ और पोषित रखने में माताओं की सहायता करने के आंगनवाड़ी कर्मियों के तरीके में बदलाव ला रहा है। वर्तमान में, स्वास्थ्य कर्मियों को 11 रजिस्टरों में सूचना दर्ज करनी पड़ती है, जो कष्टदायक, ज्यादा समय खर्च करने वाली और बेढंगी प्रक्रिया है। सीएएस का इस्तेमाल करके, प्रत्येक आंगनवाड़ी कर्मी, महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी फौरन अपने मोबाइल फोन में दर्ज कर सकती है, यह जानकारी केंद्रीय आंकड़ा आधार (सेंट्रल डेटाबेस) में दर्ज होते ही तत्काल उपयोगी बन जाती है। पांच राज्यों में अब लगभग 500 आंगनवाड़ी कर्मी मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रही हैं और यह तादाद लगातार बढ़ रही है। लगभग 40 लाख महिलाओं और बच्चों की सेहत से जुड़ी जानकारी मिलनी शुरू हो चुकी है, जिससे उनकी वृद्धि और पोषण की स्थिति का बहुमूल्य तस्वीर उपलब्ध हो रही है। 2020 तक, देश भर में सभी 14 लाख आंगनवाड़ी कर्मी इस प्रणाली का इस्तेमाल कर रही होंगी।

ऐसा नहीं है कि इससे केवल आंगनवाड़ी कर्मी ही अपने समुदायों की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों की वास्तविक सूचना प्राप्त कर सकेंगी। निर्णयकर्ता भी इसकी बदौलत जिलों और क्षेत्रों की निगरानी करने में समर्थ हो सकेंगे और तत्काल हस्तक्षेप या अतिरिक्त संसाधनों की जरूरतों के बारे में एक ही नजर में जान लेंगे।

 

इलैक्ट्रॉनिक वैक्सीनेशन इंटेलिजेंस नेटवर्क (ईवीआईएन)

यह मोबाइल फोन आधारित व्यवस्था भी भारत के स्वास्थ्य केंद्रों में टीकों की आपूर्ति की स्थिति पर नजर रखने और उनकी पूर्ति करने के तरीके में बदलाव ला रही है। कागज पर रिकॉर्ड रखने के पुराने तरीकों की सटीकता विश्वसनीय नहीं थी और क्योंकि केंद्रीय कार्यालयों तक सूचना पहुंचने में हफ्तों लगते थे, इसलिए कोई नहीं जान पाता कि भंडार कब तक खाली रहेगा या खराब उपकरण दोबारा चलने की स्थिति में कब आएगा। अब, मोबाइल—आधारित इलैक्ट्रॉनिक वैक्सीनेशन इंटेलिजेंस नेटवर्क (ईवीआईएन) की बदौलत, कागज—आधारित व्यवस्था में मौजूद बहुत की खामियां दूर हो चुकी हैं।

ईवीआईएन का निर्माण सरकार ने एक सॉफ्टवेयर कम्पनी और गेट्स फाउंडेशन सहित अनेक गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से किया है। रेफ्रिजरेटर्स और फ्रीजर्स में लगे संवेदक (सेंसर्स) तापमान में आए बदलाव की जानकारी केंद्रीय आंकड़ा आधार (सेंट्रल डेटाबेस) को अपने आप दे देते हैं, जिससे इस बात का संकेत मिल जाता है कि उपकरण को मरम्मत करने या बदले जाने की जरूरत है। टीकों की आपूर्ति मिलते ही टीकाकरण स्थलों के प्रबंधक उनके आंकड़े दर्ज कर देते हैं, जिससे आपूर्ति की स्थिति की जानकारी मिल जाती है। अतीत में, जिला—स्तरीय प्रशासक, अपनी प्रणालियों में आपूर्ति नहीं कर पाते थे : अगर किसी स्वास्थ्य केंद्र में भंडार खत्म हो जाता, तो वहां केंद्रीय स्थल से आपूर्ति भिजवानी पड़ती थीं। अब, कर्मी ऐसे नजदीकी केंद्रों का पता लगा सकते हैं, जहां भंडार आवश्यकता से अधिक मात्रा में मौजूद है और वहां से आपूर्ति तत्काल आपूर्ति कराई जा सकती है, क्योंकि ईवीआईएन उनके मार्ग और तापमान पर नजर रखता है। कम—संसाधन वाले नेटवर्क में भी टैक्नॉलोजी बेहतर ढंग से काम कर सकती है।

जिन स्थानों पर ईवीआईएन लागू है, वहां भंडार खत्म होने की समस्या आधी रह गई है और जल्द ही यह व्यवस्था अन्य दवाओं पर भी लागू कर दी जाएगी। यह व्यवस्था इतनी सफल रही है, कि फिलीपींस, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, नेपाल और थाईलैंड सहित अन्य देश भी इस पर विचार कर रहे हैं।

 

उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग

लिम्फैटिक फिलारियासिज (एलएफ) या एलिफन्टाइअसिस (हाथी पांव) भारत का एक प्राचीन और उपेक्षित रोग है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, वर्तमान में 65 करोड़ से ज्यादा भारतीयों के इस रोग का शिकार बनने की आशंका है। इस रोग में सूजन होती है, जिससे दर्द और अक्षमता की स्थिति उत्पन्न होती है। जिन लोगों में इसके लक्षण होते हैं, उन्हें भयावह सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है। भारत ने 2020 तक इस रोग के उन्मूलन का लक्ष्य तय किया है। एलएफ को जड़ से मिटाने की प्रमुख रणनीतियों में से एक —एहतियातन मास—ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एमडीए) है। संक्रमित लोगों के खून के प्रवाह में से परजीवी का सफाया करने के लिए वर्तमान एमडीए रेजिमेन में दो औषधियां —एल्बेन्डाज़ोल और डाइथिल्कार्बामाजाइन सिट्रेट (डीईसी) का उपयोग किया जाता है। इसके बावजूद इस बीमारी के जड़ से समाप्त होने का लक्ष्य पूरा हो पाना कठिन है। इसका मुख्य कारण एमडीए की संक्रमित लोगों तक पर्याप्त पहुंच न होना है।

पिछले कुछ वर्षों से, गेट्स फाउंडेशन भारत के एलएफ कार्यक्रम को मजबूती प्रदान करने के लिए प्रमुख साझेदारों के साथ काम कर रही है। 2015 में, हमने डेथ ऑफ ओन्कोसेर्सियासिज और लिम्फैटिक फिलारियासिज (डीओएलएफ) प्रोजेक्ट में सहायता दी थी, जिससे पता चला कि कोत दिव्वार और पापुआ न्यू गिनी में तीसरी औषधि, लीवरमेक्टिन को इस मिश्रण में शामिल करने से उपचार का रेजिमेन कहीं ज्यादा प्रभावी बन गया। प्रमाण से पता चलता है कि इन तीन दवाओं की एक खुराक— लीवरमेक्टिन, डीईसी और एल्बेन्डाज़ोल (आईडीए)— ने रोगी के खून से इस परजीवी का लगभग सफाया कर दिया।

इन आंकड़ों के आधार पर, 2016 में, हमने तीन—औषधियों के रेजिमेन के प्रभाव और सुरक्षा को स्थापित करने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और डब्ल्यूएचओ सहित अन्य संगठनों के साथ साझेदारी की। भारत की आबादी पर किए गए व्यापक अध्ययन के बाद, नए रेजिमेन की सुरक्षा स्थापित की जा चुकी है और भारत सरकार भविष्य में एमडीए में उपचार की प्रमुख रणनीति के रूप में आईडीए को शुरू करने की योजना बना रही है। इस नवाचार और परीक्षण की बदौलत इस घातक रोग का राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर सफाया हो पाना संभव प्रतीत हो रहा है।



 

निष्कर्ष

जैसा कि बिल गेट्स ने कहा है, ''भारत कुछ ऐसा करने का प्रयास कर रहा है, जो पहले कभी नहीं हुआ।'' देश अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों को अपनाने की कोशिश कर रहा है, ताकि गरीबों के सामने आने वाले सबसे चुनौतीपूर्ण मसलों के हल में योगदान दिया जा सके। नए समाधानों का आविष्कार करने के लिए जोखिम लेने और लोगों के जीवन में सुधार लाने इच्छा दिखाने का यह संगम अभूतपूर्व है।

भारत, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्रयास कर रहा है, जिनसे देश और विश्व भर में समुदायों के जीवन में व्यापक बदलाव आएगा। बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन में, हम इस देश की महत्वाकांक्षाओं के दायरे और संभावनाओं की सराहना करते हैं और इस विज़न को सभी के लिए ठोस नतीजों में बदलने में सहायता करने का अवसर पाना अपना सौभाग्य समझते हैं।

नचिकेत मोर, पीएचडी
निदेशक, भारतीय कार्यालय,
बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन