भारत में एक दशक से भी पहले हमने एचआईवी बचाव के अभियान के साथ अपने काम की शुरुआत की थी। तब से स्वास्थ्य क्षेत्र में हमारे प्रयास बढ़ते गए और अब इनमें मातृत्व और बाल स्वास्थ्य, पोषण, टीके और नियमित टीकाकरण, परिवार नियोजन और कुछ चुनिंदा संक्रामक रोगों का नियंत्रण भी शामिल है।

मातृत्व, नवजात और बाल स्वास्थ्य

चुनौती

मातृत्व और बाल स्वास्थ्य के लिहाज से पिछले एक दशक के दौरान भारत ने काफी प्रगति की है। लेकिन अब भी हर साल 50,000 माताएं प्रसव संबंधी समस्याओं की वजह से और एक साल से कम उम्र के दस लाख से ज्यादा बच्चे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की वजह से जान गंवा देते हैं। अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवा कर इनमें से 95 फीसदी मौतें रोकी जा सकती हैं।


अवसर

हमारा मानना है कि अगर भारत के आर्थिक विकास का लाभ देश के सर्वाधिक गरीब परिवारों और समुदायों तक पहुंचाना है, तो इसके लिए मातृत्व और बाल स्वास्थ्य को बेहतर बनाना बेहद जरूरी है। स्वास्थ्य संबंधी संसाधनों को बढ़ाने, डॉक्टरों और नर्सों के प्रशिक्षण, विभिन्न तरह की दवाओं के उत्पादन की क्षमता बढ़ाने और विश्व भर में मान्य तकनीकी क्षेत्र को खड़ा करने में भारत ने काफी प्रगति की है। ऐसे में माताओं और बच्चों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने का यह बिल्कुल सही समय है। इसके लिए प्रमाणित समाधानों को अधिक व्यापक रूप से लागू करना होगा। इनमें नवजात बच्चों, प्रसव संबंधी मामलों और प्रसव पूर्व देखभाल पर जोर देना, प्रसव अस्पताल में करवाना, स्तनपान तुरंत शुरू करना और सिर्फ मां का दूध ही देना तथा नियमित टीकाकरण को बढ़ाने जैसे प्रयास शामिल हैं।


हमारी रणनीति

भारत सरकार ने जच्चा-बच्चा देखभाल के लिए राष्ट्रीय मानक तय किए हैं और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, पहुंच और लागत पर गंभीरता से काम कर रही है। हम सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण देने, निगरानी व्यवस्था स्थापित करने, स्वास्थ्य कर्मियों को तैयार करने और लोक स्वास्थ्य को बेहतर करने के लिए नई तकनीक की पहचान करने सहायता तथा वित्तीय सहयोग प्रदान कर इन प्रयासों में मदद करते हैं।

टीकाकरण

चुनौती

भारत में पैदा होने वाले हर पांच बच्चों में से एक की मौत पांच वर्ष की आयु से पहले ही ऐसी बीमारी से हो जाती है, जिन्हें सुरक्षित और प्रभावी टीकों के इस्तेमाल से रोका जा सकता है। टीके स्वास्थ्य क्षेत्र में अब तक के सबसे किफायती और प्रभावी उपायों में से हैं और इनकी मदद से हर साल लाखों जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।


अवसर

भारत मौजूदा टीकाकरण व्यवस्था को सुदृढ़ कर और विचारपूर्वक नए टीकों को शामिल कर बाल मृत्यु दर को बहुत कम कर सकता है। इस तरह डायरिया और निमोनिया जैसी व्यापक प्रभाव वाली बीमारियों को रोका जा सकता है, जिनके कारण पांच साल से कम उम्र के बच्चों की 30 फीसदी से अधिक मौतें होती हैं।


हमारी रणनीति

भारत में तकनीकी विशेषज्ञों का विशाल समूह और सार्वजनिक, निजी तथा गैर-लाभार्थ साझेदारों द्वारा मिलकर काम करने की पिछली उपलब्धियां यहां शोध एवं अविष्कारों की विशाल संभावना पेश करती है। हम बेहतर और किफायती टीकों के विकास में मदद करते हैं और टीकाकरण व्यवस्था को मजबूत करने व इसकी उपलब्धता बढ़ाने के लिए काम करते हैं।

बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारों के साथ हमारी भागीदारियों जरिए जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य कार्यक्रमों के अंतर्गत नियमित टीकाकरण को बेहतर बनाने के लिए काम कर रहे हैं।

परिवार नियोजन

चुनौती

अगर महिलाओं के पास परिवार नियोजन के विभिन्न साधन उपलब्ध रहें, तो इनके उपयोग की संभावना बढ़ती है। लेकिन भारत में यह ज्यादा महिलाओं को उपलब्ध नहीं है। जिन महिलाओं की परिवार नियोजन की जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं, उनमें किशोर और युवा महिलाओं तथा सर्वाधिक गरीब व पिछड़े इलाकों की महिलाओं का औसत ज्यादा है।


अवसर

महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिहाज से परिवार नियोजन सर्वाधिक प्रभावी और किफायती साधनों में शामिल है। बच्चे पैदा करने हैं या नहीं और कब करने हैं, इस संबंध में अगर पूरी जानकारी ले कर फैसला करने के लिए महिलाओं को सक्षम बना दिया जाए तो मां एवं नवजात मृत्यु की आशंका कम हो जाती है। इससे महिलाओं के लिए शैक्षणिक और आर्थिक अवसर भी बढ़ेंगे और स्वस्थ्य परिवारों तथा समाज का निर्माण होगा।


हमारी रणनीति

हम राष्ट्रीय स्तर पर तथा बिहार व उत्तर प्रदेश में योजनाबद्ध सहायता प्रदान करते हैं, जिससे परिवार नियोजन जरूरतों का आंकलन, साधनों की उपलब्धता में रुकवाटों व आर्थिक मुश्किलों की पहचान करने में मदद मिलती है, और साथ ही तथा परिवार नियोजन सेवाओं की गुणवत्ता व उपलब्धता को बेहतर बनाने में तकनीकी सहयोग भी देते हैं। हम कार्यक्रमों के प्रदर्शन की निगरानी करने, आंकड़े जमा करने में मदद करने के अलावा सरकारों और साझेदारों के बीच तालमेल बढ़ाने में भी मदद करते हैं।

हम निजी साझेदारों के साथ भी काम करते हैं ताकि गुणवत्तापूर्ण परिवार नियोजन साधन व सेवाएं मुहैया कराई जा सके। साथ ही हम सामुदायिक संगठनों व महिला स्वयं-सहायता समूहों के साथ काम करते हैं ताकि परिवार नियोजन के विकल्पों के बारे में सही सूचना पहुंचाई जा सके।

पोषण

चुनौती

कुपोषण दर के लिहाज से भारत दुनिया में शीर्ष देशों में है। यहां के पांच साल से कम उम्र के बच्चों की लगभग आधी मौतें कुपोषण से ही होती हैं। बहुत सी भारतीय माताओं को गर्भावस्था के दौरान सही पोषण नहीं मिल पाता, जिससे कम वजन के बच्चे के पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है, ऐसे बच्चों में बीमारी और मृत्यु का खतरा अधिक होता है और यह डर भी रहता है कि वह जीवन भर कुपोषित ना रह जाएं।


अवसर

बेहतर पोषण के लिए प्रमाणित किफायती साधन अब उपलब्ध हैं। इनकी उपलब्धता को बढ़ा कर भारत बाल मृत्यु दर को घटा सकता है और बच्चों के मानसिक विकास को भी बढ़ा सकता है।


हमारी रणनीति

हम भारत सरकार के साथ मिल कर बेहतर पोषण के लिए काम करते हैं। इसके लिए हम यह दिखाते हैं कि उपलब्ध तरीकों को ज्यादा व्यापक रूप से लागू किया जाए तो इसके क्या नतीजे आ सकते हैं और साथ ही हम नए समाधान ढूंढ़ने में भी मदद करते हैं। हमारे काम में राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय साझेदार शामिल होते हैं जो विभिन्न उपायों को बड़े स्तर पर ले जाने में मदद करते हैं। इनमें मातृत्व पोषण, स्तनपान जल्द शुरू करने और सिर्फ स्तनपान करवाने, पूरक आहार देने, माइक्रोन्यूट्रिएंट सप्लीमेंट देने, भोजन के फोर्टिफिकेशन और गंभीर कुपोषण वाले बच्चों का इलाज जैसे उपाय शामिल हैं।

पोषण संबंधी हमारे प्रयासों में शोध और आंकड़ों का विश्लेषण भी शामिल है ताकि कुपोषण के कारणों को बेहतर तरीके से समझा जा सके, ज्यादा प्रभावी उपाय तैयार किए जा सकें और प्रगति पर नजर रखी जा सके।

टीबी

चुनौती

दुनिया में टीबी (ट्यूरबोकोलोसिस) का हर चौथा मरीज भारत में है। यह बीमारी हर रोज लगभग एक हजार भारतीयों की जान ले रही है। गरीब लोगों को यह ज्यादा प्रभावित करती है और दो तिहाई टीबी के मामले इन्हीं के होते हैं, जिसकी वजह से इनके ऊपर भारी वित्तीय और सामाजिक संकट आ खड़ा होता है।


अवसर

टीबी की जांच और इलाज को बेहतर कर भारत इसके संक्रमण को रोक सकता है और टीबी नियंत्रण के प्रयासों को मजबूत कर सकता है। विशेष रूप से निजी अस्पतालों एवं डॉक्टरों को यह प्रयास करने होंगे।


हमारी रणनीति

हम टीबी के सामान्य और मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) मामलों की बेहतर पहचान और इलाज के लिए निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की मदद करने पर विशेष ध्यान देते हैं। एमडीआर टीबी के मामलों में टीबी की अधिकांश दवाएं काम नहीं करतीं और इसका इलाज मुश्किल होने के साथ महंगा भी है। हम निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की उपचार प्रक्रियाओं को इलाज के राष्ट्रीय मानकों के अंतर्गत लाने के उपायों पर भी काम करते हैं।, साथ ही टीबी व एमडीआर टीबी की बेहतर जांच एवं इलाज के लिए भी काम करते हैं और टीबी निगरानी के लिए डिजिटल उपकरणों जैसे सहयोगी साधन उपलब्ध कराते हैं।

कुछ उदाहरण

एचआईवी

वर्ष 2002 में विशेषज्ञों का आंकलन था कि भारत में एचआईवी की महामारी काफी अधिक बढ़ सकती है और ऐसे में यहां किसी भी दूसरे देश से ज्यादा संक्रमण के मामले होंगे। ऐसी चिंताजनक आशंका को देखते हुए, हमने उस साल भारत में अपना पहला निवेश किया। एचआईवी से बचाव के कार्यक्रम आवाहन को 1296 करोड़ रुपये का अनुदान दिया गया जो समुदाय-संचालित संगठनों और गैर सरकारी संगठनों की साझेदारी में शुरू किया गया था।

आवाहन ने ज्यादा संक्रमण वाले छह राज्यों में सेक्स वर्करों व अन्य ऐसे समूहों पर ध्यान केंद्रित किया है जिन पर खतरा ज्यादा है। इसके शुरू होने के बाद से भारत में एचआईवी संक्रमण की दर नाटकीय रूप से घटी है। बीते वर्षों में सरकार ने इस कार्यक्रम को योजना के तौर पर अपना लिया और अब हमारे प्रयास संवेदनशील समुदायों पर केंद्रित हैं ताकि इस सेवा को ज्यादा विस्तार दिया जा सके।

आवाहन एचआईवी से निपटने के राष्ट्रीय कार्यक्रमों के बेहतरीन उदाहरणों में शामिल है। हालांकि एचआईवी अब भी देश के लिए एक चुनौती बना हुआ है, लेकिन अब नए मामलों की संख्या घट कर प्रति वर्ष 86,000 रह गई है। आवाहन की कामयाबी ने फाउंडेशन को भारतीय साझेदारों के साथ स्वास्थ्य और विकास से जुड़े दूसरे क्षेत्रों में इसी तरीके से अन्य साझेदारों के साथ काम करने हेतु प्रेरित किया है।


पोलियो

दुनिया को पोलियो मुक्त करने की दिशा में मार्च 2014 में एक अहम प्रगति हुई, जब भारत को पोलियो मुक्त होने का प्रमाणपत्र हासिल हुआ। जनसंख्या घनत्व, प्रवास की ऊंची दर, स्वच्छता की कमी, ऊंची जन्म दर और नियमित टीकाकरण की निम्न दर की वजह से भारत के बारे में लंबे समय से माना जा रहा था कि यहां पोलियो को समाप्त करना बहुत मुश्किल होगा। भीड़-भरे झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों और दूर-दराज के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे रह रहे थे जिनका टीकाकरण नहीं हो रहा था। वर्ष 2009 तक दुनिया के 50 फीसदी पोलियो के मामले सिर्फ भारत में ही सामने आ रहे थे।

लेकिन भारत सरकार ने अपने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ मिल कर एक बेहतर तालमेल वाला पोलियो अभियान चलाया जिसमें लाखों स्वयंसेवकों की टीकाकरण टीमें हर साल 17 करोड़ बच्चों को पोलियो की खुराक देने के लिए लगातार पहुंचती रही। अंतरराष्ट्रीय साझेदारों में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ), यूनिसेफ, यूएसएड, रोटरी इंटरनेशनल और हमारा फाउंडेशन शामिल था।

2011 में भारत में पोलियो का अंतिम मामला दर्ज किया गया। 2014 में भारत को आधिकारिक तौर पर पोलियो मुक्त होने का प्रमाणपत्र मिल गया और इससे अगले कुछ वर्षों के अंदर दुनिया को पोलियो-मुक्त बनाने का रास्ता साफ हो गया।